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देश को विकसित बनाने में कृषि वैज्ञानिकों की भूमिका होगी अहम : डॉ पीएस पांडेय
Doorbeen News Desk: डॉ राजेन्द्र प्रसाद केंद्रीय कृषि विश्वविद्यालय पूसा के विद्यापति सभागार में तीन दिवसीय अनुसंधान परिषद की बैठक का आयोजन किया गया जिसका शुभारंभ आगत अतिथि व कुलपति ने दीप प्रज्वलित कर किया गया। उपस्थित वि वि के कुलपति डॉ पी एस पांडेय ने कहा कि विश्वविद्यालय में अनुसंधान के क्षेत्र में तीव्र प्रगति हुई है लेकिन हमें अंतरराष्ट्रीय स्तर में बेहतर बनने की जरूरत है।
उन्होंने कहा कि देश को विकसित बनाने में वैज्ञानिकों की अहम भूमिका होगी । उन्होंने कहा कि कृषि के भविष्य की चुनौतियों को ध्यान में रखते हुए वैज्ञानिकों को अनुसंधान करने की आवश्यकता है। उन्होंने कहा कि जलवायु अनुकूल कृषि के क्षेत्र में विश्वविद्यालय ने राज्य सरकार के साथ मिलकर अच्छा कार्य किया है और चौथे कृषि रोड मैप के तहत राज्य के कृषि विकास में महत्वपूर्ण भूमिका दी है। उन्होंने कहा कि बिहार में छोटे जोत के किसान अधिक है इसलिए ऐसे यंत्रों को विकसित करने की जरूरत है जो स्वचालित तरीके से काम कर सके और उसका लागत भी कम हो।

उन्होंने कहा कि डिजिटल एग्रीकल्चर के क्षेत्र में विश्वविद्यालय को अब रोबोटिक्स , प्रेसीजन फार्मिंग और इंटरनेट आफ थिंग्स पर भी काम करना होगा। उन्होंने कहा कि विश्वविद्यालय ने समेकित कृषि का माडल विकसित किया है लेकिन अब छोटे व मध्यम जोत वाले किसानों को ध्यान में रखकर कई नये माडल विकसित करने की जरूरत है । पूर्व कुलपति डॉ ए आर पाठक ने कहा कि विश्वविद्यालय डॉ पांडेय के नेतृत्व में पूरे देश को नई राह दिखा रहा है।

उन्होंने कहा कि नेचुरल फार्मिंग के क्षेत्र में कोर्स व अनुसंधान शुरू करने वाला यह पहला विश्वविद्यालय है। उन्होंने कहा कि अब सभी विश्वविद्यालयों में नेचुरल फार्मिंग पर कोर्स शुरू करने का निर्णय सरकार ने लिया है। उन्होंने कहा विश्वविद्यालय का दीक्षारंभ भी सभी विश्वविद्यालयों में लागू किया गया है । उन्होंने ने कहा कि विश्वविद्यालय का जलवायु अनुकूल अनुसंधान परियोजना राज्य के तेरह जिलों में पचहत्तर हजार से अधिक किसानों की आमदनी में बीस प्रतिशत से अधिक की वृद्धि हुई है। तीस प्रतिशत से अधिक पानी की बचत हुई है । किसानों ने पैंतीस प्रतिशत कम खाद का प्रयोग किया है। उन्होंने कहा कि विश्वविद्यालय की यह परियोजना आने वाले समय में देश और दुनिया को नई राह दिखायेगा।
पूर्व कुलपति डॉ जे पी शर्मा ने कहा कि भारत मे जोत का आकार घटकर एक हेक्टेयर से भी कम हो गया है। पानी की उपलब्धता पहले की तुलना में काफी तेजी से कम हो रही है और किसानों का खेती से मोहभंग हो रहा है। उन्होंने कहा कि विश्वविद्यालय के वैज्ञानिकों को इन तीनों पर ही काम करने की आवश्यकता है। उन्होंने कहा कि खेती को अब एक व्यवसाय का रूप देने की आवश्यकता है ताकि नवयुवक इस ओर आकर्षित हो और उन्हें अहसास हो कि कृषि से न सिर्फ मुनाफा कमाया जा सकता है बल्कि इस कार्य में सम्मान भी है। पूर्व कुलपति डॉ ए के व्यास ने कहा कि मनुष्य और प्रकृति का स्वास्थ्य कृषि से जुड़ा हुआ है। मिट्टी का स्वास्थ्य खराब होगा तो पौधों और फसलों का स्वास्थ्य खराब होगा और फिर मनुष्य का स्वास्थ्य खराब होगा। उन्होंने कहा कि पूरी प्रकृति एक दूसरे से जुड़े हुए हैं। कृषि वैज्ञानिकों को भी अपने अनुसंधान में यह ध्यान रखना चाहिए और ऐसी परियोजनाओं को विकसित करना चाहिए जो प्रकृति को , मिट्टी को, फसलों को और मनुष्य को फायदा पहुंचा सके। एन आर सी लीची के निदेशक डॉ विकास दास ने कहा कि भारत में अन्न की कमी नहीं है अब हमें पोषण सुरक्षा पर ध्यान देना चाहिए ताकि लोगों को संपूर्ण पोषण मिल सके।
निदेशक अनुसंधान डॉ ए के सिंह ने विश्वविद्यालय में चल रहे अनुसंधान परियोजनाओं के बारे में बताया और कहा कि इस बैठक में 133 नये अनुसंधान परियोजनाओं पर मंथन किया जायेगा। इसके साथ ही विश्वविद्यालय में चल रहे राष्ट्रीय एवं अंतर्राष्ट्रीय परियोजनाओं सहित अन्य परियोजनाओं की समीक्षा की जायेगी। इस दौरान संचालन डॉ प्रियंका त्रिपाठी ने जबकि धन्यवाद ज्ञापन सह निदेशक अनुसंधान डॉ एस के ठाकुर ने किया। कार्यक्रम के दौरान निदेशक शिक्षा डॉ उमाकांत बेहरा, डीन पीजीसीए डॉ मयंक राय, डीन बेसिक साइंस डॉ अमरेश चंद्रा, डीन फिशरीज डॉ पी पी श्रीवास्तव, निदेशक कृषि व्यवसाय एवं ग्रामीण प्रबंधन डॉ रामदत्त, डॉ घनश्याम झा, डॉ महेश कुमार, डॉ शिवपूजन सिंह, डॉ कुमार राज्यवर्धन सहित शिक्षक वैज्ञानिक एवं पदाधिकारी उपस्थित थे ।





