व्हाट्सएप से जुड़ने को क्लीक करें
Doorbeen News Desk: समस्तीपुर। स्वतंत्रता संग्राम में अविस्मरणीय योगदान देने वाले वरिष्ठ बाबू समाज के सच्चे वाहक थे। महात्मा गांधी के विचारों से प्रभावित होकर महज 20 वर्ष की उम्र में ही वे आजादी की लड़ाई में कूद पड़े थे। वर्ष 1937 से 1947 तक उन्होंने गांव-गांव घूमकर युवाओं में देशभक्ति की भावना का संचार किया। सुभाष चंद्र बोस के आजाद दस्ता के आह्वान के बाद जिले के छात्र और युवा राष्ट्र की बलिवेदी पर बलिदान देने को तैयार थे।
जेपी और लोहिया को जेल से निकालने की बनी थी योजना
अंग्रेजों ने जयप्रकाश नारायण और डॉ. राम मनोहर लोहिया को गिरफ्तार कर नेपाल के हनुमान जेल भेज दिया था। इसी दौरान आंदोलनकारियों ने दोनों नेताओं को जेल से बाहर निकालने की योजना बनाई। अक्टूबर 1943 में गिरफ्तारी के बाद आजाद दस्ता ने उन्हें जेल से निकालने की रणनीति तैयार की। इसकी जिम्मेदारी समस्तीपुर के चकसलेम निवासी कृष्णचंद्र सिंह उर्फ रघे बाबू को दी गई थी।


योजना के अनुसार रात करीब 12 बजे जेल से बाहर निकलने का समय तय किया गया। उस समय टावर पर पहरेदारों की ड्यूटी बदलती थी, जिसमें करीब पांच मिनट का समय लगता था। इसी दौरान बाहर से रस्सी फेंककर बंदियों को निकालने की योजना बनाई गई। हालांकि, सिपाही को इसकी भनक लग गई और उसने सीटी बजा दी। इसके बावजूद आंदोलनकारियों ने हिम्मत नहीं छोड़ी।
आजाद दस्ते ने किया जेल पर हमला
इसके बाद वरिष्ठ बाबू आजाद दस्ते के दो दर्जन से अधिक साथियों के साथ हनुमान जेल पहुंचे और संयुक्त रूप से जेल पर हमला कर जयप्रकाश नारायण, डॉ. राम मनोहर लोहिया, बैजनाथ सहाय सहित कई बंदियों को आजाद कराने में सफलता हासिल की। बाद में अंग्रेजी शासन ने आंदोलनकारियों को फांसी की सजा सुनाई, लेकिन देश के आजाद होने के कारण वे बच गए।


आजादी के बाद भी वरिष्ठ नारायण सिंह का सार्वजनिक जीवन सक्रिय रहा। वे किसानों और समाज के हितों के लिए लगातार काम करते रहे तथा कल्याणपुर विधानसभा क्षेत्र के विधायक भी बने। स्वतंत्रता आंदोलन में उनके योगदान और साहस की कहानी आज भी नई पीढ़ी के लिए प्रेरणादायक है।

*एनीमिया की रोकथाम और उपचार को लेकर मास्टर ट्रेनरों का प्रशिक्षण, जांच से लेकर फॉलोअप तक की दी गई जानकारी – Doorbeen News*







