प्रेक्टिकल कर बताया गया किसानों को मधुमक्खी पालन का तरीका

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प्रेक्टिकल कर बताया गया किसानों को मधुमक्खी पालन का तरीका

Doorbeen News Desk: संयुक्त कृषि भवन, बाजार समिति के प्रागंण में मधुमक्खीपालन विषय पर दो दिवसीय जिला के अंदर कृषक प्रशिक्षण कार्यक्रम का समापन हुआ। प्रशिक्षण के दूसरे दिन किसानों को ट्रेनर के द्वारा प्रेक्टिकल कर दिखाया गया, कि किस तरह मधुमक्खी पालन करना है।

ट्रेनर ने बताया कि मधुमक्खी मोम, शाही जेली और लघु उद्योग अद्वितीय है। साथ ही गरीब, बेरोजगारों के लिए उपयोगी है। सप्ताह में केवल कुछ घंटे लगाने की व्यवसाय के रूप में यह आदर्श है।

मेलीफेरा के एक छत्ते से आधा से एक किलो तक पराग निकाला जा सकता है। यह बाजार में सौ रुपये प्रति किलो की दर से बिकता है। कमी के समय में इसे मधुमक्खियों को पराग पूरक के रूप में खिलाया जाता है। इस काम में इसका सर्वाधिक उपयोग होता है। इसे धूप में सूखाने के बाद एयर टाइट पात्र में रखा जाता है। बाद में पराग की कमी के समय मधुमक्खीपालक को बेचा जा सकता है। पराग चिकित्सा और रोग निरोध प्रयोजनों के लिए भी उपयुक्त होता है।

बराबर मात्रा में शहद के साथ मिलाकर इसका उपयोग हाइपरटेंशन में किया जाता है। तंत्रिक और इंडोक्राइन प्रणाली की शिकायत होने पर भी इसका उपयोग होता है। सौंदर्य प्रसाधनों के निर्माण के लिए भी यह बहुत उपयोगी है। मौके पर जिला कृषि पदाधिकारी -सह- आत्मा परियोजना निदेशक डॉ सुमीत सौरभ, उप परियोजना निदेशक, आत्मा गंगेश कुमार चौधरी,  सुमित कुमार , वरीय वैज्ञानिक, कीट विज्ञान डॉ० नागेन्द्र कुमार एवं डॉ मनोज कुमार,  सुनील कुमार, राज्य स्तरीय मास्टर ट्रेनर, मधुमक्खीपालन राहुल रंजन आदि थे।

:मधुमक्खियों द्वारा फसलों के उत्पादन में वृद्धि : मधुमक्खियों विभिन्न प्रकार के पौधों पर जाकर अपने वंश के लिए पराग एवं पुष्परस इकट्ठा करती है। हमारे देश को लगभग 160 लाख हेकटेयर भूमि कीट परागित फसलों में घिरी हुई है। इन फसलों में फल, सब्जियों एवं तेलहन आदि शामिल है। यह भी अनुमान लगाया जा चुका है कि प्रकृति में जो भी फूल पाये जाते हैं, उन फलों में 5 प्रतिशत स्वयं परागण तथा 95 प्रतिशत फल परपरागण के होते हैं। इनमें परागण 10 प्रतिशत हवा के द्वारा और 85 प्रतिशत कीटों के द्वारा होता है।

कीटों द्वारा परागण के कार्य में 90 प्रतिशत अकेले मधुमक्खी ही परागण का कार्य करती है। इस प्रकार मधुमक्खी एक उपयोगी परागणकर्ता सिद्ध होती है। राजेन्द्र कृषि विश्वविद्यालय, बिहार, पूसा (समस्तीपुर) द्वारा फसलों में मधुमक्खी परागण के प्रयोग किये गये और पाया कि मौनों द्वारा पर-परागण से ऊपज में लगभग 60-70 प्रतिशत की वृद्धि होती है। इसके अलावा बीजों के आकार, वजन, अंकुरण क्षमता आदि में भी वृद्धि होती है। यदि मधुमक्खिपालन को मधु, मोम आदि उत्पादों के उत्पादन के लिए बढ़ावा दिया जाय तो, यह पर-परागण के लिए भी लागकारी सिद्ध होगा।

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