शिक्षा विभाग के ACS के वायरल वीडियो की होगी जांच, विधान परिषद में उठा मामला तो जांच को बनी कमेटी

दूरबीन डेस्क। बिहार विधान परिषद की पहली पाली की कार्यवाही बुधवार को शुरू होते ही शिक्षा विभाग के अपर मुख्य सचिव (ACS) केके पाठक के वायरल वीडियो का मामला जमकर उछला। सबसे पहले इस मामले को भाजपा एमएलसी संजय मयूख ने उठाते हुए कहा कि एसीएस ने विभागीय वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग में अभद्र भाषा का प्रयोग किया है। इनके खिलाफ तुरंत कार्रवाई होनी चाहिए। उन्होंने सदन पटल पर वीडियो क्लिप वाला पेन ड्राइव रखते हुए इसे सदन में चलाने की भी मांग की। उनके समर्थन में भाजपा के देवेश कुमार, अनिल शर्मा, संजीव कुमार सिंह और राबड़ी देवी समेत विपक्षी दल के कई सदस्य उतर गए।

इस पर सभापति देवेशचंद्र ठाकुर ने सार्वजनिक रूप से इस वीडियो को चलाने से मना कर दिया। अपनी अगुवाई में एक कमेटी का गठन किया, जो उनके कार्यालय कक्ष में इस वीडियो क्लिप को देखेगी और इससे संबंधित रिपोर्ट तैयार करके राज्य सरकार को सौंपेगी। ताकि इस पर राज्य सरकार आगे की कार्रवाई कर सके। इस कमेटी में एक उप-मुख्यमंत्री के अलावा 4-5 सदस्यों को रखा गया है। सदन में पूरे बहस के दौरान किसी मंत्री या सदस्य ने अपर मुख्य सचिव का नाम अधिकारिक तौर पर नहीं लिया।

डिप्टी सीएम सम्राट चौधरी ने कहा कि किसी की व्यक्तिगत भावनाओं को ठेस पहुची है तो संबंधित अधिकारी पर कार्रवाई की जाएगी। वही शिक्षा मंत्री विजय कुमार चौधरी ने कहा कि सरकार शिक्षकों का सम्मान करती है। शिक्षक या किसी आम नागरिक को गाली देने का अधिकार किसी अधिकारी को नही है।जहां तक विभाग के एसीएस के खिलाफ कार्रवाई का प्रश्न है, तो सभापति की कमेटी अपनी रिपोर्ट में जो अनुशंसा करेगी, उस आधार पर निर्णय लिया जाएगा। उन्होंने वीडियो क्लिप को सदन में चलाने का विरोध करते हुए कहा कि गलत परंपरा की शुरुआत नहीं करनी चाहिए।

राजद के रामचंद्र पूर्वे ने कहा कि शिक्षक को आहत करने वाला व्यवहार नहीं होना चाहिए। अजय कुमार सिंह ने कहा कि कुछ ब्यूरोक्रेट सरकार चला रहे हैं। महेश्वर सिंह ने कहा कि बार-बार शिक्षक को अपमानित किया जा रहा है। संजय कुमार सिंह ने कहा कि राज्यपाल को पत्र लिखने पर भी एसीएस पर कार्रवाई नहीं हुई। शहनवाज हुसैन ने कहा कि एक अधिकारी इतना ताकतवर हो गया कि पूरा सदन चिंता कर रहा है और कोई कार्रवाई नहीं हो रही है। उन्होंने भी वीडियो नहीं चलाने की वकालत करते हुए कहा कि जन प्रतिनिधियों को भी नहीं समझने वाले अधिकारी के खिलाफ कार्रवाई क्यों नहीं हो रही है। एमएलसी राजेंद्र प्रसाद गुप्ता, गुलाम गौस, हरि सहनी समेत अन्य ने कहा कि इस तरह के अधिकारी का होना शिक्षा जगत के लिए ठीक नहीं है। एक मेडिकल बोर्ड का गठन कर उनकी जांच करानी चाहिए। (सा.एलएच)

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