विश्व की प्राचीन, समृद्ध, उत्कृष्ट एवं गौरवशाली भारतीय संस्कृति में नारी का सदा रहा है सम्मान- डॉ कामदेव

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Darbhanga News: ललित नारायण मिथिला विश्वविद्यालय, दरभंगा के स्नातकोत्तर संस्कृत विभाग एवं डॉ प्रभात दास फाउंडेशन के संयुक्त तत्त्वावधान में “वैदिक वाङ्मय में नारी-विमर्श” विषयक राष्ट्रीय सेमिनार का आयोजन पीजी संस्कृत विभाग में किया गया, जिसमें कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय, हरियाणा के पूर्व संस्कृत-प्राध्यापक एवं प्रधानाचार्य डॉ कामदेव झा- मुख्य अतिथि, सीएमबी कॉलेज, घोघरडीहा, मधुबनी के प्रधानाचार्य प्रो जीवानन्द झा- उद्घाटन कर्ता, पूर्व प्रधानाचार्य प्रो विद्यानाथ झा- सम्मानित अतिथि, डॉ आर एन चौरसिया- विषय प्रवेशक, डॉ शिवानन्द झा एवं डॉ प्रियंका राय- विशिष्ट वक्ता, डॉ ममता स्नेही- स्वागत कर्ता, डॉ मोना शर्मा- धन्यवाद कर्ता, जिग्नेश कुमार- संचालन कर्ता, डॉ राजीव कुमार, फाउंडेशन के सचिव मुकेश कुमार झा, प्रो अरुण कुमार कर्ण, डॉ संजीव कुमार साह, डॉ प्रवीण कुमार, बीएमए कॉलेज, बहेड़ी के डॉ विजय कुमार मिश्र, अनिल कुमार सिंह, बबलू, राहुल, राजू शर्मा, श्वेता, सीमा, ज्योति, परिधि, मंजू, योगेन्द्र, उदय, अमित, राजू, प्रियंका, शिवानी, अपर्णा, रानी सहित 110 से अधिक व्यक्ति उपस्थित थे, जिन्हें फाउंडेशन की ओर से प्रमाण पत्र प्रदान किया गया।

दीप प्रज्वलन से संगोष्ठी का शुभारंभ हुआ, जबकि समापन राष्ट्रगान से। अतिथियों का स्वागत पाग, चादर एवं पुष्प-पौधों से किया गया। वैदिक मंगलाचरण डॉ विजय कुमार मिश्र ने प्रस्तुत किया। वहीं नारी पर स्वरचित कविता-पाठ कुमकुम कुमारी ने किया।
मुख्य अतिथि डॉ कामदेव झा ने कहा कि वेद कालीन नारी विद्या, धन, बल आदि से युक्त थीं जो अपने इच्छानुसार सुयोग्य वर का चयन भी करती थीं। बिना पत्नी के पुरुष यज्ञ के अधिकारी नहीं हो सकते थे, जबकि गृहिणी के बिना गृह घर या परिवार नहीं हो सकता। न+ अरि, अर्थात् नारी पुरुष की शत्रु नहीं हो सकती, बल्कि दोनों प्रगति रूपी गाड़ी के दो पहिए के समान हैं, जिनमें संतुलन अनिवार्य है। उन्होंने विभिन्न तरह के वैदिक एवं आधुनिक दृष्टांत देते हुए रोचक ढंग से कहा कि भारतीय संस्कृति विश्व की प्राचीन, समृद्ध, उत्कृष्ट एवं गौरवशाली संस्कृति है, जिसमें नारी का सदा ही सम्मान रहा है। यह सदा से ही विश्व वंदनीय एवं सर्वजन वरणीय रही है।

शिव शक्ति (पार्वती) के कारण ही शक्तिशाली हो पाये। उन्होंने वैदिक ऋषिकाएं- घोषा, आपला, लोपामुद्रा, सरस्वती आदि के बारे में विस्तार से चर्चा करते हुए कहा कि पत्नी ही पति को पतन से भी बचाती है। पत्नी के बिना पति अधूरा होता है, इसी कारण पत्नी को अर्धांगिनी भी कहा जाता है।

प्रो जीवानन्द झा ने कहा कि वैदिक नारियां सार्वदेशिक एवं सर्वकालिक रूप से प्रासंगिक हैं। नारी सम्मान से ही कोई भी परिवार, समाज या राष्ट्र उन्नति कर खुशहाल हो सकता है। वैदिक नारियां विदुषी एवं समाज सुधारक थीं, जिनका हमारी संस्कृति में काफी सम्मान रहा है।

प्रो विद्यानाथ झा ने मैत्रेयी, गार्गी आदि वैदिक नारियों की शैक्षणिक, दार्शनिक एवं आध्यात्मिक क्षमता पर विस्तृत प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि हमें माता, बहन, बेटी तथा पत्नी रूपी नारी को आगे बढ़ने का पूर्ण प्रयास करना चाहिए। डॉ प्रियंका राय ने कहा कि वेद कालीन समाज हमारे आदर्श हैं, जिनका अनुकरण करने की जरूरत है। हमें नारियों को उसकी वास्तविक एवं आंतरिक शक्तियों का स्मरण करने की जरूरत है। वे ही विद्या, धन एवं शक्ति की स्वरूपा हैं।

डॉ शिवानन्द झा ने कहा कि नारी हमारे लिए पूजनीय रही हैं। इनकी महत्ता वैदिक काल से आधुनिक काल के साथ ही भविष्य में भी बनी रहेगी। डॉ विजय कुमार मिश्र ने कहा कि नारी भगवती रूप में सदा पूजनीय रही हैं। वे मातृ रूपा हैं, जिसे उऋण होना असंभव है।
विषय प्रवेश करते हुए डॉ आर एन चौरसिया ने कहा कि वैदिक नारी शिक्षा, स्वतंत्रता और आध्यात्मिक उन्नति शिखर पर थीं, जिनका ज्ञान, धन एवं धर्म आदि में समान अधिकार प्राप्त था। नारी केवल गृहणी ही नहीं, बल्कि संस्कार, संस्कृति एवं परंपरा की वाहिका भी हैं। कहा कि वैदिक काल में उनका उपनयन संस्कार भी होता था तथा उन्हें पारिवारिक एवं सामाजिक निर्णय में भागीदारी का भी अधिकार प्राप्त था।

वह माता के रूप में शिक्षिका तथा गृहिणी के रूप में घर की धुरी थी। वेद में नारी को ‘घर की लक्ष्मी’, ‘समाज की जननी’ तथा ‘धर्म की आधारशिला’ कहा गया है। अध्यक्षीय संबोधन में डॉ कृष्ण कान्त झा ने कहा कि वैदिक नारी शिक्षित, स्वाधीन, धार्मिक, विदुषी तथा समाज की मार्गदर्शिका थीं। आज आवश्यकता है कि वैदिक आदर्श से प्रेरणा लेकर नारी-सम्मान, शिक्षा, स्वतंत्रता एवं समानता की भावना को पुनः सुदृढ़ किया जाए। कहा कि वैदिक साहित्य आज नारी के सम्मान, अधिकार, शिक्षा और महत्ता का अमूल स्रोत है।

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