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एनीमिया, पोषण व माहवारी पर खुलकर चर्चा, नोडल शिक्षिकाओं को मिला व्यवहारिक प्रशिक्षण
Doorbeen News Desk: समस्तीपुर। शहर के आरएसबी इंटर विद्यालय के सभागार में इक्विटी कार्यक्रम के अंतर्गत एडोलेसेंट प्रोग्राम फॉर गर्ल्स विषय पर एक दिवसीय गैर-आवासीय प्रशिक्षण कार्यक्रम का आयोजन किया गया। इस प्रशिक्षण में समस्तीपुर, शिवाजीनगर, पूसा सहित अन्य प्रखंडों से आई शिक्षिकाओं ने भाग लिया।
कार्यक्रम का उद्देश्य किशोरियों के सर्वांगीण विकास और सशक्तिकरण को बढ़ावा देना रहा।
प्रशिक्षण को संबोधित करते हुए डीपीओ (एसएसए) जमालुद्दीन ने कहा कि किशोरावस्था जीवन का अत्यंत संवेदनशील चरण है। यह वह समय होता है जब सामाजिक, सांस्कृतिक, आर्थिक एवं जैविक स्तर पर महत्वपूर्ण परिवर्तन होते हैं, जो वयस्क जीवन की आधारशिला रखते हैं।

उन्होंने कहा कि इस अवधि में लड़कियों को लैंगिक भेदभाव, यौन उत्पीड़न, बाल विवाह, तस्करी तथा किशोरावस्था में गर्भावस्था जैसी चुनौतियों का सामना करना पड़ता है, जिससे उनके विकास की संभावनाएँ प्रभावित होती हैं। चिकित्सक डॉ. श्रेयसी ने मासिक धर्म संबंधी वैज्ञानिक जानकारी देते हुए बताया कि सामान्यतः 9 से 14 वर्ष की आयु (औसतन 12 वर्ष) के बीच मासिक धर्म की शुरुआत होती है। यह शरीर के परिपक्व होने का संकेत है।
उन्होंने बताया कि गर्भाशय की परत प्रतिमाह टूटकर रक्तस्राव के रूप में बाहर निकलती है, जो सामान्यतः 3 से 5 दिनों तक रहता है। प्रारंभिक वर्षों में मासिक धर्म अनियमित हो सकता है, जो सामान्य प्रक्रिया का हिस्सा है।
संभाग प्रभारी सह एपीओ सुजीत कुमार ने कहा कि कार्यक्रम का मुख्य उद्देश्य किशोरियों में सामाजिक कौशल का विकास, स्वास्थ्य संबंधी जानकारी एवं सेवाओं तक उनकी पहुँच सुनिश्चित करना, शिक्षा निरंतरता के अवसर बढ़ाना तथा समुदाय में नेतृत्व क्षमता को प्रोत्साहित करना है।
मास्टर ट्रेनर सुभीत कुमार सिंह ने बताया कि यह कार्यक्रम शिक्षा, जीवन कौशल, यौन एवं प्रजनन स्वास्थ्य, मासिक धर्म स्वास्थ्य एवं स्वच्छता, पोषण, लैंगिक समानता, नेतृत्व क्षमता और आजीविका जैसे महत्वपूर्ण विषयों पर केंद्रित है, ताकि किशोरियाँ आत्मनिर्भर और जागरूक बन सकें।
वरीय शिक्षक सह प्रधानाध्यापक रणजीत कुमार ने कहा कि मासिक धर्म आज भी समाज में एक संवेदनशील विषय बना हुआ है। इससे जुड़े सामाजिक कलंक, अंधविश्वास और रूढ़िवादी सोच के कारण लड़कियाँ खुलकर संवाद नहीं कर पातीं। उन्होंने इस विषय पर खुली चर्चा और जागरूकता को आवश्यक बताया।
प्रधानाध्यापक सौरभ कुमार ने कहा कि किशोरावस्था शारीरिक, भावनात्मक और सामाजिक परिवर्तन का महत्वपूर्ण समय है। इस दौरान लड़कियों को उनके अधिकारों के प्रति जागरूक करना और हानिकारक सांस्कृतिक मानदंडों को चुनौती देने के लिए प्रेरित करना आवश्यक है। ट्रेनर कुमारी शुभांगी एवं डॉली मिश्रा ने कहा कि किशोरावस्था जीवन का महत्वपूर्ण विकासकाल है, जिसमें उचित मार्गदर्शन और समर्थन से उज्ज्वल भविष्य की नींव रखी जा सकती है। परिवार और समाज का दायित्व है कि वे किशोरों को समझें और सकारात्मक दिशा प्रदान करें। अधिवक्ता प्रकाश कुमार ने डिजिटल युग की चुनौतियों पर प्रकाश डालते हुए कहा कि किशोरों का मस्तिष्क नई तकनीकों के अनुकूल तेजी से ढलता है, इसलिए उन्हें सही डिजिटल मार्गदर्शन देना आवश्यक है। प्राचार्य डॉ. ललित कुमार घोष ने बताया कि 11 से 18 वर्ष की आयु के बीच पिट्यूटरी ग्रंथि से एस्ट्रोजन एवं प्रोजेस्टेरोन हार्मोन का स्राव होता है, जिससे शारीरिक और मानसिक परिवर्तन होते हैं।

कार्यक्रम में शिक्षक ऋतुराज जायसवाल, राहुल कुमार, अर्चना कुमारी सहित अन्य शिक्षकों की उपस्थिति रही। प्रशिक्षण के माध्यम से किशोरियों के सशक्तिकरण, स्वास्थ्य जागरूकता और नेतृत्व क्षमता के विकास की दिशा में सार्थक पहल की गई।





