लनामिवि, दरभंगा के दर्शनशास्त्र विभाग में “भगवद्गीता में भारतीय ज्ञान परम्परा के बीज तत्त्व” पर एकल व्याख्यान सम्पन्न

व्हाट्सएप से जुड़ने को क्लीक करें

Doorbeen News Desk: ललित नारायण मिथिला विश्वविद्यालय,दरभंगा के विश्वविद्यालय दर्शनशास्त्र विभाग के सभागार कक्ष में “श्रीमद्भगवद्गीता में भारतीय ज्ञान परम्परा के बीज तत्त्व” विषय पर एकल व्याख्यान का आयोजन हुआ। कार्यक्रम की अध्यक्षता विभागाध्यक्ष डॉ शिखर वासिनी ने की। मुख्य वक्ता के रूप में विभाग के पूर्व विभागाध्यक्ष डॉ रुद्रकांत अमर उपस्थित रहे। सम्मानित अतिथि के रूप में पूर्व विभागाध्यक्ष डॉ शिवानंद झा ने शिरकत की।

कार्यक्रम का शुभारम्भ राष्ट्रगीत “वन्दे मातरम्” से हुआ। इसके बाद राष्ट्रगान और कुलगीत का गायन हुआ। फिर दीप प्रज्वलन कर कार्यक्रम का विधिवत६ उद्घाटन किया गया। तदुपरान्त अतिथियों का अभिनंदन पाग एवं चादर ओढ़ाकर किया गया तथा स्मृति-स्वरूप एक पौधा अर्पित किया गया जो प्रकृति-संरक्षण के संकल्प और पर्यावरण-चेतना का प्रतीक है। स्वागत भाषण विभाग की डॉ प्रियंका राय ने दिया।

उन्होंने कहा कि गीता भारतीय चिन्तन की वह धारा है, जिसमें उपनिषदों का ब्रह्मविचार, सांख्य का तत्त्वविवेचन और योग की साधना एक साथ प्रवाहित होती है। ऐसे विमर्श से नई पीढ़ी को अपनी ज्ञान-परम्परा से जुड़ने का अवसर मिलता है। सम्मानित अतिथि डॉ शिवानन्द झा ने कहा कि ज्ञान परम्परा केवल अतीत की धरोहर नहीं है, वह जीवन जीने की दृष्टि है। गीता का निष्काम कर्म का सिद्धान्त आज भी व्यक्ति और समाज, दोनों का मार्गदर्शन करता है।

मुख्य वक्ता डॉ रुद्रकांत अमर ने अपने विस्तृत व्याख्यान में श्रीमद्भगवद्गीता में निहित भारतीय ज्ञान परम्परा के बीज तत्त्वों पर क्रमबद्ध एवं गहन विवेचन प्रस्तुत किया। उन्होंने आत्मा की नित्यता, स्थितप्रज्ञता, निष्काम कर्म, ज्ञान-कर्म-भक्ति का समन्वय, समत्व-योग इत्यादि बीज तत्त्वों पर विशेष प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि गीता किसी एक दर्शन की पुस्तक नहीं, भारतीय ज्ञान परम्परा का बीज-कोश है। इसमें उपनिषदों की आत्मविद्या, सांख्य का तत्त्वविवेक, योग की समत्व-दृष्टि और कर्म की लोकोपयोगिता एक साथ मिलती है।

ये सब वे बीज हैं जो आगे चलकर भारतीय दर्शन की विविध शाखाओं में पल्लवित हुए। उन्होंने आगे कहा, गीता की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि वह ज्ञान को जीवन से अलग नहीं करती। यहाँ तत्त्वचिन्तन का लक्ष्य केवल जानना नहीं, जानकर जीना है। इसीलिए अर्जुन का विषाद दार्शनिक जिज्ञासा में बदलता है और जिज्ञासा कर्तव्य-बोध में। यही भारतीय ज्ञान-परम्परा की मौलिकता है कि उसमें अध्यात्म और व्यवहार, व्यक्ति और समाज, चिन्तन और आचरण परस्पर विरोधी नहीं, पूरक हैं।

अन्त में उन्होंने कहा कि आज के संकटग्रस्त समय में गीता का यह समन्वयवादी दृष्टिकोण नई पीढ़ी को सन्तुलित और उत्तरदायी जीवन-दृष्टि दे सकता है। अध्यक्षीय उद्बोधन में डॉ शिखर वासिनी ने कहा कि दर्शन का उद्देश्य केवल विचार करना नहीं, विचार को जीवन में उतारना है। गीता हमें ज्ञान और कर्म के समन्वय का मार्ग दिखाती है। विभाग ऐसे विमर्श की परम्परा को आगे भी जारी रखेगा।

धन्यवाद ज्ञापन डॉ संजीव कुमार साह ने किया। उन्होंने अतिथियों, वक्ताओं, शिक्षकों, शोधार्थियों और विद्यार्थियों के प्रति आभार व्यक्त करते हुए कहा, आपकी उपस्थिति ने इस विमर्श को सार्थक बनाया है। मंच संचालन विभाग के छात्र ईशान कुमार ने किया। कार्यक्रम में विभाग के शिक्षक, शोधार्थी और बड़ी संख्या में विद्यार्थी उपस्थित रहे।

*दरभंगा स्नातक निर्वाचन क्षेत्र :समस्तीपुर में विधान परिषद चुनाव को लेकर राजद की बैठक संपन्न – Doorbeen News*

दरभंगा स्नातक निर्वाचन क्षेत्र :समस्तीपुर में विधान परिषद चुनाव को लेकर राजद की बैठक संपन्न

One Comment

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *