पोस्टमार्टम के बाद शव घर पहुंचते ही मचा कोहराम, पूरे गांव में नहीं जले चूल्हे, अंतिम संस्कार में उमड़ा जनसैलाब

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समस्तीपुर: शिवाजीनगर प्रखंड अंतर्गत परसा पंचायत के बोरज गांव में सोमवार को हुए हृदयविदारक हादसे के बाद दूसरे दिन मंगलवार को भी पूरे गांव में मातमी सन्नाटा पसरा रहा। पिता के सामने ही करेह नदी के बरियाही घाट पर स्नान के दौरान डूबे तीन सगे भाइयों की मौत से न सिर्फ परिजनों बल्कि पूरे गांव के लोगों का कलेजा फट गया है। पोस्टमार्टम के बाद जैसे ही तीनों मासूमों का शव घर पहुंचा, परिजनों की चीत्कार से माहौल गमगीन हो उठा। हर आंख नम थी और हर जुबान पर सिर्फ यही सवाल आखिर एक साथ तीन तीन बेटों को किसकी नजर लग गई।

बताया जाता है कि बोरज गांव वार्ड 7 निवासी सुदर्शन कुमार झा के तीनों पुत्र आदित्य कुमार, हर्षित कुमार और कार्तिक कुमार सोमवार की दोपहर करीब एक बजे करेह नदी में नहाने के दौरान डूब गए थे। घटना के वक्त पिता भी मौके पर मौजूद थे, लेकिन देखते ही देखते तीनों बच्चे गहरे पानी में समा गए। इस दर्दनाक मंजर ने पिता को अंदर तक तोड़ दिया। घटना के बाद स्थानीय लोगों, मछुआरों और शिवाजीनगर पुलिस की मदद से बचाव कार्य शुरू किया गया। करीब पांच घंटे की कड़ी मशक्कत के बाद एक एक कर तीनों बच्चों के शव को नदी से बाहर निकाला जा सका।

इसके बाद पुलिस ने शवों को कब्जे में लेकर पोस्टमार्टम के लिए सदर अस्पताल समस्तीपुर भेज दिया। रात करीब दो बजे शव गांव पहुंचते ही माहौल पूरी तरह गम में डूब गया। मंगलवार को गांव में शोक की लहर और गहरी हो गई। हालात ऐसे रहे कि गांव के किसी भी घर में चूल्हा नहीं जला। लोग दिनभर मृतक परिवार के घर पहुंचकर उन्हें ढांढस बंधाते रहे, लेकिन जैसे ही कोई परिजनों को सांत्वना देने जाता, खुद भी रो पड़ता। मां आशा देवी का रो-रोकर बुरा हाल है। वे बार-बार अपने बेटों का नाम लेकर बेहोश हो जा रही हैं। होश में आने पर फिर विलाप शुरू हो जाता है।

ग्रामीणों के अनुसार सुदर्शन कुमार झा बेहद गरीब परिवार से हैं और दिल्ली के नेहाल बिहार इलाके में सुरक्षा गार्ड का काम कर अपने परिवार का भरण-पोषण करते हैं। उनके तीनों बेटे वहीं रहकर पढ़ाई करते थे। रामनवमी के अवसर पर पूरा परिवार गांव आया हुआ था। खुशियों का माहौल था, लेकिन किसे पता था कि यह खुशी मातम में बदल जाएगी। बताया गया कि सुदर्शन कुमार झा के परिवार में यही तीन पुत्र थे। अब इस हादसे के बाद वे पूरी तरह निसंतान हो गए हैं। परिवार की आर्थिक स्थिति पहले से ही कमजोर थी, ऐसे में यह दुख पहाड़ बनकर टूट पड़ा है। मृतक का दादा विदेश्वर झा ने कहा कि तीन पोतों का जाना उनके जीवन की सबसे बड़ी क्षति है। उन्होंने कहा कि तीनों बच्चे बेहद शांत और होनहार थे, जिनसे परिवार को काफी उम्मीदें थीं।

मंगलवार को गांव के ही करेह नदी किनारे तीनों भाइयों का अंतिम संस्कार किया गया। एक साथ तीन चिताएं सजाई गईं, जिसने हर किसी की आंखें नम कर दीं। बड़े भाई आदित्य कुमार को उनके चचेरे दादा तारकेश्वर झा ने मुखाग्नि दी, जबकि हर्षित कुमार को चाचा नित्यानंद झा और कार्तिक कुमार को चाचा लोकनाथ झा ने अंतिम विदाई दी। तीनों भाई को अलग-अलग चीता में मुख अग्नि दिया गया। इस दौरान बड़ी संख्या में ग्रामीण मौजूद रहे और माहौल पूरी तरह गमगीन बना रहा।
गौरतलब है कि सोमवार को तीनों भाई ननिहाल जाने वाले थे। मामा उन्हें लेने भी पहुंचे थे, लेकिन घर में पूजा-पाठ के कारण वे नहीं जा सके। अगर वे उस दिन ननिहाल चले जाते, तो शायद यह हादसा नहीं होता। इस बात को लेकर भी परिजन बार-बार बिलख उठते हैं।

जिस घर में कुछ दिन पहले तक रामनवमी की खुशियां गूंज रही थीं, आज वहां सन्नाटा पसरा है। मां-बाप के सारे अरमान एक झटके में टूट गए। गांव में हर कोई इस घटना से स्तब्ध है और ईश्वर से यही प्रार्थना कर रहा है कि इस दुख की घड़ी में परिवार को संबल मिले। मृतकों के मां आशा देवी पुत्र वियोग में बार-बार बेहोश हो रहे हैं। होश आने पर बच्चों का नाम लेकर विलाप करते हैं। तीनों को पढ़ाकर अफसर बनाने का सपना भी टूट गया।

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