बदली होली:-ढोलक व मृदंग की आवाज के लिए तरस रही काने, गुजरे जमाने की बात हो गई अब होली

बदली होली:-ढोलक व मृदंग की आवाज के लिए तरस रही काने, गुजरे जमाने की बात हो गई अब होली

Doorbeen News Desk: खानपुर:-रंग और उमंग के त्योहार होली को लेकर अब वैसा उत्साह नहीं दिखता है।पहले लोग उमंग के साथ लोगों से मिलते थे।रंग व अबीर लगाकर आत्मीयता, सादगी व अनुशासन का परिचय देते थे।अब ऐसी होली क्षेत्र में नहीं खेली जाती है।अब होली को लोग हुड़दंग के रूप में लेते हैं।पहले एक दिन लोग एक दूसरे को कीचड़ लगाते थे।कोई बुरा नहीं मानता था।दूसरे दिन रंग खेल कर होली मनाते थे।पहले एक महीने तक फगुआ गाने का चलन था।लेकिन अब ढोलक व मिरदंग के साथ फगुआ गीत गुजरे जमाने की बात हो गई है।होली के दिन दिखने वाली सभ्यता और संस्कृति धीरे-धीरे विलुप्त होती जा रही है।जब एक माह पूर्व से गांव के हर दरवाजे पर कीर्तन मंडली होली की गीत गाते थे, उस समय गांव के युवा, बुजुर्ग भी बढ़-चढ़कर हिस्सा लेते थे।होली के दिन घर-घर जाकर लोग बैंड, बाजों, ढोलक, झाल, के साथ होली गीत होता था, प्रेम भाईचारे के बीच लोग एक दूसरे को रंग-गुलाल लगाते थे।उस समय के नजारा काफ रोमांचक होता था।लेकिन समय के साथ अब सबकुछ बदल गया।रंगों का त्यौहार अब हुड़दंग में सिमट कर रह गया है।न ही वह समय है, और न ही लोग दिलचस्पी दिखा रहे हैं।

:::क्या कहते हैं, बुजुर्ग और युवा, पहले और अब की होली में फर्क बताते लोग:-खानपुर के 85 वर्षीय शिक्षाविद दीवाकर मिश्र ने बताया कि पहले की होली और अब के होली में काफी अंतर आ गया है।पहले बसंत पंचमी दिन फगुआ की लोक गीत शुरू हो जाता था।गांव के चौपाल पर प्रत्येक दिन ढोल और मिरदंग के साथ गांव के युवा और बुजुर्ग जमा हो जाते थे।इस कार्यक्रम में गांव के बड़े बुजुर्ग से लेकर बच्चे तक जमा होते थे।लेकिन अब ऐसी बात होली में नहीं रह गई है।

::खानपुर के युवा गंगेश कुमार ठाकुर का कहना है कि अब होली के गीत ढोलक और मंजीरे गुजरे जमाने की बात हो गई है।पहले सम्मत के जलाने के समय गांव के सारे लोग एक जगह इकट्ठे होते थे।एक ही जगह सम्मत जलाई जाती थी।लेकिन अब ऐसा देखने को नहीं मिलता है।होली का दिन अब हुड़दंग में बदल गया है।सभ्य लोग उस दिन घर से बाहर निकलने में भी परहेज करते दिखते हैं।::शोभन बसंतपुर के समाजसेवी राजीव कुमार झा बताते हैं कि पहले की होली में प्रेम, भाईचारे, मर्यादा, सभ्यता की खुशबू झलकती थी।इसमें आपसी विद्वेष की भावना को लोग भूलकर रंग-गुलाल एक दूसरे को लगाते थे।युवा, बुजुर्गों की टोली घर-घर जाकर होली के गीत हर दरवाजे पर गाते थे, व लोगों को बधाई देते थे।लेकिन अब ऐसी बात नहीं रह गई है।
::जिला परिषद सदस्य प्रियंका कुमारी ने कहा कि होली तो गिले-शिकवे दूर करने का पर्व है।लेकिन अब पहले भी बात नहीं रह गई है।सभ्य लोग अब होली में घरों से निकलने से परहेज करते हैं।बदलते परिवेश में ये सबकुछ विलुप्त होता जा रहा है।हालांकि शराब बंदी के बाद हुरदंग व मारपीट जैसी घटना पर ब्रेक जरूर लगी है।पहले राम खेले होली, लक्षमण खेले होली…., गोरे-गोरे कलश मंगाया उसमें घोरा रंग…गीतों की मीठी तान सुनाई देता था।लेकिन अब डीजे की धमक पर अश्लील गीतों की बोल से समाज शर्मसार होने लगा है।देसी गीत स्थानीय बोली में गाकर लोग होली का आनंद उठाते थे।अब आधुनिक तौर तरीकों ने होली के पुराने स्वरूप को बदल दिया है।

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