पशु-पक्षियों को बचाने के लिए ठाकुरवाड़ी के महंत और युवाओं की अनोखी पहल, ताकि, भीषण गर्मी में प्यासा ना रहे कोई बेजुबान, करते रहें जलदान

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समस्तीपुर। आप शिक्षित हो गए इसका मतलब यह नहीं है कि सब कुछ हुआ। शिक्षा के महत्व में कोई संदेह नहीं है, लेकिन शिक्षा के साथ-साथ नैतिकता भी सुधारी जानी चाहिए। क्योंकि, नैतिकता के बिना शिक्षा का मूल्य शून्य है। बाबासाहेब डॉ. आंबेडकर की इन पंक्तियों को संबल देते हुए बड़ी ठाकुरवाड़ी साखमोहन के महंत डॉ. शंभू कुमार ने नैतिकता का जो परिचय दिया है, उससे मानवीय संवेदना जाग उठी है। इन्हें बेजुबानों के दाना-पानी की इसलिए चिंता है कि पारिस्थितिकी तंत्र में बदलाव और मानवीय कारणों से विभिन्न प्रजातियों के पशु-पक्षी विलुप्त ना होने पाए। इन्होंने बेजुबान पशु -पक्षियों के दु:ख-दर्द को अपनी काया का दर्द मानकर जो अनोखी पहल की है, उसे लोग अपनी दिनचर्या में शामिल कर रहे हैं। डॉ. शंभू की मानें तो सूरज की तपिश और बेहाल कर देने वाली इस भीषण गर्मी में जन-जीवन अस्त-व्यस्त है। तापमान के चढ़ते पारा ने सबको बेचैन कर रखा है।

फसलें सूख रही। साधारण जीवन जीने वालों से लेकर लक्जरी लाइफ स्टाइल वाले लोग भी परेशान हैं। गर्म हवाओं के थपेड़ों से बचने के इंतजाम में हर कोई हीं लगा है। वहीं एक तरफ अधिकांश जल स्त्रोतों के सूखने व पानी गर्म हो जाने से मुश्किलें बढ़ी है। दूसरी तरफ गर्मी से बेहाल पशु-पक्षियों को प्यास बुझाने के लिए कोई कारगर व्यवस्था नहीं होने का मलाल है। ये बताते हैं कि इन्हें बेजुबानों की चिंता हुई तो ठाकुरवाड़ी परिसर समेत करीब 20 जगहों पर छांव तले दाना-पानी की व्यवस्था कर रखी है। गर्मी के शुरुआती दिनों से निरंतरता बनाकर दूसरों को भी आग्रह पूर्वक ऐसा करने की सलाह दे रहे। ताकि, पशु-पक्षियों के संरक्षण के लिए छोटे-छोटे प्रयास बड़े बदलाव का वाहक बन सके। रंग-बिरंगे पशु-पक्षियों के अस्तित्व पर संकट को टाला जा सके।

पीएचडी की योग्यता रखने वाले डॉ. शंभू कुमार की मौसेरी बहन पूजा कुमारी सीआरपीएफ जीडी गांधीनगर गुजरात में पोस्टेड थी। अचानक दर्द के कारण तबियत बिगड़ी और तीन-चार दिन बाद विगत 27 मई को वीरगति को प्राप्त हो गई। बलिदानी पूजा की याद में डॉ. शंभू एक फाउंडेशन बनाकर बेजुबान पशु-पक्षियों दाना-पानी और प्राथमिक उपचार की व्यवस्था करेंगे। यह जरुरी नहीं कि रोशनी चरागों से हीं हो, शिक्षा से भी घर रोशन होते हैं। यह कथन स्कूल व कालेजों में गर्मी छुट्टी के साथ घर पर रह रहे छात्र-छात्राओं की साकारात्मक सोच को सराह रही है। छुट्टियों में युवावर्ग अपने परिवार वालों के साथ क्वालिटी टाइम बीता रहे। इनमें शिक्षा की रोशनी ने जीवन जीने तरीके भी बखूबी बदले हैं।

इनके द्वारा घरवालों व स्वजनों के अलावा पेड़-पौधों और पशु-पक्षियों की देख-रेख की गतिविधि दूसरों के लिए सबक है। छात्र राजीव रंजन बताते हैं कि छोटे-छोटे जलस्त्रोतों के सूखने की वजह से बेसहारा पशु-पक्षी पानी की खोज में इधर-उधर भटकते दिखे हैं। कईयों को पानी के बगैर तड़प कर जान गंवाने की सूचना ने अंतर्मन तक झकझोर दिया। इसलिए ऐसे पशु-पक्षियों के लिए सुबह-शाम एक गड्ढ़े में पानी भरते हैं। ताकि, बेजुबान अपनी प्यास बुझा सकें। जल स्त्रोतों के निकट कुत्ते, बिल्ली, लोमड़ी, सियार, मैना, कबूतर, कौआ आदि पक्षियों का आना-जाना सुकून देता है। छात्र गौरव कुमार, सत्यम शिवम, समाजसेवी अमित कुमार, दीपक कुमार, प्रियांशु कुमार समेत कई अन्य युवा भी इस प्रकार की गतिविधि में सक्रिय हैं। इनके कार्यों की सराहना हो रही है।

जानकारों के मुताबिक पुराणों में इस बात की चर्चा है कि मार्गशीर्ष के महीने में अग्नि का दान और जेठ, अषाढ़ और सावन के महीने में जलदान से पाप धुलते हैं। घर के आसपास या छतों पर पक्षियों के लिए दाना-पानी रखने से घर में स्मृद्धि आती है। सनातन धर्म में बेजुबान जानवरों की सेवा करने के लिए कहा गया है। इसका अपना धार्मिक महत्व है। पशुओं और पक्षियों की सेवा करने से मन को काफी शांति मिलती है। कुछ पशु-पक्षी प्रेमियों का मानना है कि जिनका बुध कमजोर होता है, उनके द्वारा पक्षियों को दाना खिलाने से ठीक होने लगता है। हमारे आसपास के सभी जीव-जंतुओं में हमरी तरह हीं जीवन हैं। उसे भी भोजन-पानी की दरकार होती है। कुछ पालतू जानवरों या पक्षियों के लिए तो हम लोग कुछ हद तक व्यवस्था कर देते हैं। मगर, बेसहारा पशु-पक्षियों के लिए अगर हम-आप नहीं सोचेंगे तो उसकी सूधि लेने वाला कोई नहीं है।

इस भीषण गर्मी में इन बेसहारों के लिए दाना-पानी की व्यवस्था की जिम्मेदारी उठाने के बाद हीं इसका अस्तित्व बच पाएगा। बेसहारा पशु-पक्षियों के लिए दाना-पानी को हमेशा छांव वाले स्थान पर रखें। बर्तन में पानी गर्म हो जाने पर उसे सुबह-शाम जरूर बदल दें। पानी और दाना को रख रहे हैं तो थोड़ा एकांत जगहों का चयन करें, जहां पशु-पक्षी आसानी से पहुंच सकें। पानी का बर्तन जानवर या पक्षी के अनुसार होना चाहिए। रोसड़ा एसडीएम मो मुस्तकीम ने कहा कि भोजन-पानी की आवश्यकता हर एक को है। जिसमें मानवता जिंदा है, वही ऐसा सराहनीय कार्य कर सकता है। बेजुबान पशु-पक्षियों के लिए ऐसा प्रयास मानवता के लिए बड़ी बात है।  (विभूतिपुर के विनय भूषण की रपट)

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