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समस्तीपुर। कुसुम पाण्डेय स्मृति साहित्य संस्थान के तत्वावधान में केन्द्रीय विद्यालय समस्तीपुर के निकट स्थित कुसुम सदन के प्रांगण में काव्य संध्या का आयोजन किया गया। जिसमें दूर-दूर से बड़ी संख्या में रचनाकार उपस्थित हुए। डॉ रामेश गौरीश ने उपस्थित सभी रचनाकारों का हार्दिक स्वागत किया। कार्यक्रम की अध्यक्षता डॉ नरेश कुमार विकल तथा संचालन प्रवीण कुमार चुन्नू ने किया। दीपक कुमार श्रीवास्तव की रचना – मुहब्बत क्या हुई उनसे, फासला यूं बढ़ता गया। प्यार में वह समंदर बन गई, मैं रेत बन किनारे पर खड़ा रहा।

इस दौरान देश के वरिष्ठतम गजलकार नाशाद औरंगाबादी तथा रेल के पूर्व राजभाषा अधिकारी द्वारिका राय सुबोध विशिष्ट अतिथि एवं मशहूर शायर हरि नन्दन साह तथा सुप्रसिद्ध रचनाकार डॉ राम पुनीत ठाकुर तरुण मुख्य अतिथि के रूप में विराजमान रहे। कार्यक्रम के प्रारंभ में संस्था के अध्यक्ष शिवेंद्र कुमार पाण्डेय ने मई महीने में उत्पन्न हिन्दी साहित्य के आधार स्तम्भ पर चर्चा करते हुए उनके प्रति भावभीनी श्रद्धा सुमन अर्पित किया।

प्रसिद्ध स्वतंत्रता सेनानी वीर सावरकर जी का स्मरण कराती रचनाएं, भजन, ग़ज़ल, हास्य व्यंग के साथ ही भोजपुरी, मैथिली की रचनाएं मुख्य रूप से आकर्षण के केंद्र रहीं। कार्यक्रम का प्रारंभ डॉ राम सूरत प्रियदर्शी के चित्ताकर्षक मां सरस्वती की आराधना से की गई।

इस दौरान राज कुमार राय राजेश, रामाश्रय राय राकेश, अरविंद सत्यदर्शी, राज कुमार चौधरी, काविश जमाली कमर समस्तीपुरी, प्रवीण कुमार चुन्नू, शिवेंद्र कुमार पाण्डेय, रामलखन यादव, शुभम कुमार, भुवनेश्वर मिश्र, डॉ राम सूरत प्रियदर्शी, विष्णु कुमार केडिया, दीपक कुमार श्रीवास्तव,

डॉ सुनील कुमार चम्पारणी, डॉ गंगा प्रसाद आजाद सतमलपुरी, डॉ नूर मोहम्मद सेहर, मो अयूब अंसार, विकास कुमार, डॉ अशोक कुमार सिन्हा, डॉ परमानंद लाभ, नाशाद औरंगाबादी, द्वारिका राय सुबोध, डॉ नरेश कुमार विकल,

हरिनंदन साह, रंजीत कुमार, डॉ जग मोहन चौधरी, तेज नारायण सिंह तपन, देवेश कुमार, डॉ राम पुनीत ठाकुर तरुण, उदय शंकर चौधरी, पप्पू राय दानिश, अबरार अहमद, दीपक कुमार श्रीवास्तव, आफताब समस्तीपुरी, कासिम सबा, मो जावेद, रंजना लता, यशवंत कुमार सिंह, दीप प्रकाश कुमार, प्रिय रंजन अर्पण पाण्डेय आदि की रचनाएं खूब पसंद की गई। कार्यक्रम के मध्य में डॉ परमानंद लाभ की नवीनतम कृति भारतीय एकता की कड़ी भारती का समवेत रुप से लोकार्पण भी किया गया। समापन आयुष्मान प्रकाश द्वारा धन्यवाद ज्ञापन से की गई।

कवियों के द्वारा गाए कविता की चंद पंक्ति..
शोहदों सुन लो तुझमें अगर थोड़ी भी शराफ़त जिंदा है
नारी तुझ को पैदा कर के आज बहुत शर्मिन्दा है।
राज कुमार राय राजेश।
सीने में उनकी याद लिए जी रहा हूं मैं, इस प्रेम की गली में लहू पी रहा हूं मैं, जिस से किया था प्यार वो धोखा मुझे दिया, फिर भी उन्हीं की याद में सब को ढो रहा हूं मैं ।
भुवनेश्वर मिश्र।
अपने रूख से कभी जो पर्दा उठा देता है,
जर्द मौसम में भी गुलशन को खिला देता है।
कमर समस्तीपुरी।
देखते देखते जश्न ए वसंत साठ हो गया
हकीकतों और फसानों का एक गांठ हो गया।
सुनील चम्पारणी।
तुमसे बिछड़ के ये जाना है, जिंदगी क्या से क्या हो गई
तुम्हारे ही दम से थी खूशियां,अब मानोोँ सज़ा हो गई।
रंजना लता।।
हे मां सरस्वती शारदे,जग में सिरमौर रहे फिर भारत,ऐसा तू संस्कार दे।
डॉ राम सूरत प्रियदर्शी।
तुम्हारी जुल्फ की काली घटा मन को भिगोती है
नज़र उठती कि नजरो के नुकिले शूल पाता हूं।
डॉ राम पुनीत ठाकुर तरुण।
जिंदगी अपनी है जान नहीं अपनी,खून का रिश्ता है संतान नहीं अपनी, आपकी चाह पर मुस्कराता हूं भले होंठ अपने हैं मुस्कान नहीं अपनी।
हरिनंदन साह।
आप आए यहां तो सकूं था मिला, बिना बताए मगर फिर कहां चल दिए, ना सुना ना कहा कुछ बातें हुईं,छुप छुपाकर मगर आप क्यों चल दिए।
डॉ नरेश कुमार विकल।
धूप में क्यों आ गई हो, देखो तो कुम्हला गई हो
चार दिन बाहर रहा मैं, इतने में दुबला गई हो।
प्रवीण कुमार चुन्नू।
हम सभी के हाथ में जो मोबाइल है,उसका भरता नहीं है पेट
घड़ी को खा गया खाया कैमरा,खाया रिकार्डर और कैसेट
पारिवारिक शांति को तो खा ही गया, इसने खाया कवियों की दुकान
अश्लीलता की तो बाढ़ लगा दिया, चुपचाप बनकर अनजान।
शिवेंद्र कुमार पाण्डेय।
मुहब्बत क्या हुई उनसे, फासला यूं बढ़ता गया
प्यार में वह समंदर बन गई, मैं रेत बन किनारे पर खड़ा रहा।
दीपक कुमार श्रीवास्तव





