जेपी सेनानियों: जनेऊ तोड़ो, जाति मिटाओ : विभेष त्रिवेदी

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जेपी सेनानियों: जनेऊ तोड़ो, जाति मिटाओ
6 अप्रैल, 5.25 बजे संध्या, विभेष त्रिवेदी
जेपी सेनानियों, लोहिया के चेलों.. कहां हो? सिर्फ पेंशन के पैसे से मुफ्त की रोटी तोड़ते रहोगे? उठो उठो यह क्रांति की पराकाष्ठा की बेला है। अगर सप्तक्रांति से लेकर संपूर्ण क्रांति तक के जश्न में शामिल नहीं हुए तो तुम्हें धिक्कार है! कभी लोहिया, जयप्रकाश और कर्पूरी ठाकुर ने जो सपने देखे थे, वे आज साकार हो रहे हैं। तुम्हें महायज्ञ में पूर्णाहुति देनी ही पड़ेगी। तुम देख नहीं रहे कि अखबारों से लेकर सोशल मीडिया तक, टीवी चैनलों से लेकर गांव के चौपाल तक जाति से आजादी का जश्न मनाया जा रहा है? अपनी-अपनी जाति के नाम छोड़कर लोग अलग- अलग नंबर का बिल्ला लगाए घूम रहे हैं! इसी दिन का तो इंतजार था। ये नए नंबरदार चिल्ला रहे हैं। जागते रहो, कोई छूटने न पाए। सबको अपने -अपने नंबर पर गर्व है। गर्व इतना कि दूसरे नंबर वालों पर तंज कस रहे, कटाक्ष करते जा रहे हैं। बंदरों के घाव की तरह हम नंबरों से अपनी सोच, दिल-दिमाग को खुजलाए जा रहे हैं। जितना खुजलाते हैं, उतनी तसल्ली मिल रही है। गिनती पूरी होने दीजिए, हम सब सबके चूतड़ों को खुजलाएंगे। उनके कुल नंबर पूछ पूछ कर उंगली करेंगे। सबसे पहले हम जी भर कर खुद को खुजला लें। खुजलाते-खुजलाते हमारी मोटी चमड़ी से जो टपक रहा है, वह खून नहीं, सामाजिक समरसता वाला रस है। इसी रसास्वाद के लिए तो लोकनायक जयप्रकाश नारायण ने छह नवंबर 1974 को सिताबदियारा गांव में ‘जनेऊ तोड़ो, जाति मिटाओ’ आंदोलन शुरू किया था। पीपल के पेड़ के नीचे विशाल सभा हुई थी। जेपी के साथ लगभग 10 हजार लोगों ने अपना जनेऊ तोड़ यह संकल्प लिया था कि वे जाति प्रथा को नहीं मानेंगे। लो मिट गई जातियां! न रहे बांस न बाजे बांसुरी! अब सिर्फ नंबर याद रखना है। अभी तो हम बेहद खुश हैं, क्योंकि 144 और 128 में, 25 व 27 में, 20 व 124 कोई घालमेल नहीं होगा। अखबार में नंबर छपते ही, सामाजिक बदलाव की लहर चल पड़ी है! हम खुद का नहीं, दूसरों के नंबर रटे जा रहे हैं।

इतना मनोयोग से जीवन में कभी पढ़ाई नहीं की। इतनी शिद्दत से तो हमने कभी अपनी अम्मा की सेहत और बाबू जी के अरमानों का भी ख्याल नहीं रखा! यह क्रांति नहीं तो क्या है? सबको सब के नंबर की फ़िक्र है। पूरे समाज की चिंता हमें खाए जा रही है। बहुत दिनों बाद दूसरों के नंबर गिनने के इस पर्व से जातीय दरबे टूटेंगे। हम दिल से जेपी सेनानियों, लोहिया के चेलों के शुक्रगुजार हैं। हम सिर्फ जेडीयू और राजद को श्रेय नहीं लेने देंगे। इस शुभ दिन को दिखाने के लिए भाजपा ने भी कोई कोताही नहीं की। भला हुआ वे सत्ता में थे। आज हम भले ही अपनी अपनी सहूलियत से लालटेन, तीर या कमल थामे हैं, लेकिन जेपी के आह्वान पर संपूर्ण क्रांति का सपना देखने वाले चक्र हलधर छाप के ये सब दीवाने थे। उसी समय से “भ्रष्टाचार मिटाना है और नया बिहार बनाना है” की कसम खाने वाले भ्रष्टाचार मिटाने में जुटे हैं। पांच दशक पूरे होने को हैं। जेपी के चेले भ्रष्टाचार में आकंठ डूबकर उसकी जड़ ढूंढ रहे हैं। लोहिया और जयप्रकाश द्वारा घोषित ‘सप्तक्रांति’ की बलि-बेदी पर बिहार चढ़ता रहे, क्रांति की मशाल जलती रहेगी। जेपी बड़े जौहरी थे। चुन चुनकर ऐसे हीरे तराश गए जो अपने -अपने खानदान में रौशनी फैला रहे हैं। खुशहाली लाते जा रहे हैं, सात पीढ़ियां बैठकर खाती रहेंगी। गरीबों को सलामत रखते हैं, अगर गरीब नहीं रहे तो सामाजिक न्याय का नारा किसे देंगे?
जेपी सेनानियों, समाजवादियों, भय भूख और भ्रष्टाचार के तावे पर सत्ता की रोटी सेंकने वाले अपने -अपने घरों से निकलो, अखबार में नंबर ढूंढ़ो। छत पर झंडा फहराने वालों, नीचे जमीन पर उतरो, घर घर घूमकर नंबर बताओ। हर दरवाजे पर गृह संख्या के साथ जाति का नंबर लिखो। शक्ति केंद्र के पुरोधाओं, तुम्हें इस क्रांति उत्सव से एक मंत्र मिलेगा। यह सिर्फ नंबर नहीं है, सामाजिक सशक्तिकरण, एकता, भाईचारा कायम रखने के मंत्र हैं। यह मंत्र ढूंढ़ने में तुम्हारा भी उतना ही हाथ है, जितना लालटेन और तीरंदाजों का। इस पुण्य में तुम बराबर के हकदार हो। इस जश्न में वे भी शामिल हो सकते हैं जो आज तक अपने -अपने समाज के सूरजभान सिंह, रामा सिंह, राजन तिवारी, लालू प्रसाद, ब्रजबिहारी प्रसाद, शहाबुद्दीन, दुलारचंद यादव, ददन पहलवान जैसे अवतारों को पूजते आ रहे हैं।

मेरी राय है कि गांव -गांव में स्कूलों की दीवारों पर नंबर तालिका लिखी जाय। इसके तीन फायदे होंगे। पहला लाभ: इससे मनुवाद पर करारा प्रहार होगा। भला हुआ हम कभी मनुस्मृति नहीं पढ़े, अब दीवारों पर लिखी इबारत पढ़ लूंगा। दूसरा लाभ: शिक्षकों को गणना में सहूलियत होगी। तीसरा लाभ: बच्चे भी कंठस्थ कर लेंगे। कुछ सालों तक अगर प्रतियोगिता परीक्षाओं में नंबर पूछे जाएं तो जाति मिटाओ आंदोलन को सफलता मिलेगी। हमारा सामाजिक ज्ञान बढ़ेगा। मसलन, प्रश्न कुछ इस तरह के होंगे – भठियारा, कंजर, अघोरी, असुर, हलालखोर के नंबर बढ़ते क्रम में सजाओ। इस एक प्रश्न के माध्यम से बच्चों को गणित, सामान्य ज्ञान, समाजशास्त्र, अर्थशास्त्र और राजनीति शास्त्र की शिक्षा दी जा सकेगी। अच्छा रहेगा कि हर गांव की सीमान पर एक शिलालेख लगाया जाय, जिसपर लिखा हो कि यहां किस नंबर के कितने लोग बसते हैं। प्रशासनिक अधिकारियों और वोट के सौदागरों के साथ -साथ समाजशास्त्रियों और अर्थशास्त्रियों को भी बड़ी सहूलियत होगी। इससे समाज की ताकत बढ़ेगी। समाज की ताकत पर से भी पर्दा उठेगा। सद्भाव और समरसता का वातावरण पैदा होगा। नंबरों को जोड़ने वाले का माथा चकराएगा। इस नंबर का कुल कितना नंबर? उस नंबर का कुल नंबर कितने नंबर से आगे? किस नंबर का सर्वाधिक नंबर?

चैन छपरा( सिताबदियारा) में जब जेपी ने जनेऊ तोड़ा तो हजारों लोगों ने उसी सभा में जनेऊ तोड़ा। हाजीपुर में भी हजारों लोगों ने जनेऊ तोड़ा। जाति का भेदभाव मिटाने के लिये व्यापक संघर्ष हुआ था। सब लोग आगे आए थे। एक लहर चली थी। आज उस लहर के पवित्र गंगासागर में डुबकी लगाने का ऐतिहासिक अवसर है। जेपी सेनानियों, लोहियावाद की माला जप कर लोकतंत्र को परिवारवाद का हथियार बनाकर सत्ता की सवारी कर रहे महारथियों, आपको दिनकर की ये पंक्तियां ललकार रही हैं –
“अब “जयप्रकाश” है नाम देश की, आतुर, हठी जवानी का।
कहते हैं उसको “जयप्रकाश”, जो नहीं मरण से डरता है,
ज्वाला को बुझते देख, कुण्ड में, स्वयं कूद जो पड़ता है।
है “जयप्रकाश” वह जो न कभी, सीमित रह सकता घेरे में,
अपनी मशाल जो जला, बाँटता फिरता ज्योति अँधेरे में।

है “जयप्रकाश” वह जो कि पंगु का, चरण, मूक की भाषा है,
है “जयप्रकाश” वह टिकी हुई, जिस पर स्वदेश की आशा है।
हाँ, “जयप्रकाश” है नाम समय की, करवट का, अँगड़ाई का;
भूचाल, बवण्डर के ख्वाबों से, भरी हुई तरुणाई का।
है “जयप्रकाश” वह नाम जिसे, इतिहास समादर देता है,”

अगर तुम आज भी घर में चुपचाप बैठे रहे तो तुम्हें इतिहास माफ नहीं करेगा। आओ जेपी का सपना साकार करो। आओ नंबर ढूंढ़ो, नंबर बांटो। लोकतंत्र की जड़ों को मजबूत करो। आकर देखो तो सही कि कौन कितने पानी में है। अब दूध का दूध और पानी का पानी हो जाएगा। अब जातियों का विनाश तय है। जयप्रकाश नारायण ने जो फसल लगाई थी, उसे काटने की शुभ घड़ी आई है। लाठी में तेल पिलाने वाले, अंघेरी झोपड़ी में चिराग जलाने वाले, न्याय के साथ विकास करने वाले तो अपने और खानदान के लिए बरसों से फहल काटे जा रहे हैं। तुम भी काट लो। दिनकर ने एक और बात लिखी थी – जो तटस्थ है,समय लिखेगा उसका भी इतिहास।:- विभेष त्रिवेदी के फेसबुक वॉल से

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