धनतेरस पर सजी लक्ष्मी-गणेश की दुकानें, आधुनिकता की चमक में मिट्टी की प्रतिमाओं की मांग घटी

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Doorbeen News Desk: समस्तीपुर। धनतेरस को लेकर शहर के बाजारों में लक्ष्मी-गणेश की प्रतिमाओं की दुकानें सज गई हैं। दीपावली पूजन के लिए लोग अपनी पसंद और बजट के अनुसार प्रतिमाओं की खरीदारी कर रहे हैं। लेकिन आधुनिकता और चमक-दमक के बढ़ते चलन के बीच मिट्टी से बनी पारंपरिक प्रतिमाओं की मांग लगातार कम हो रही है। बाजार में अधिकांश दुकानों पर प्लास्टर ऑफ पेरिस (पीओपी) से बनी लक्ष्मी-गणेश की प्रतिमाएं बिक रही हैं। वहीं मिट्टी की प्रतिमाएं अब गिनी-चुनी दुकानों पर ही नजर आ रही हैं। इससे पारंपरिक मूर्ति बनाने वाले कुम्हारों के सामने कारोबार और आजीविका का संकट खड़ा हो रहा है।

शहर के स्टेशन रोड, मारवाड़ी बाजार, बहादुरपुर, गोला रोड, रामबाबू चौक, पुरानी पोस्ट ऑफिस रोड, मोहनपुर रोड, काशीपुर और ताजपुर रोड में धनतेरस के अवसर पर प्रतिमाओं की दुकानें सजी हैं। दुकानों पर अलग-अलग आकार, रंग और डिजाइन की लक्ष्मी-गणेश की मूर्तियां उपलब्ध हैं। इनमें पीओपी से बनी प्रतिमाओं की संख्या अधिक है। दुकानदारों के अनुसार, पीओपी की मूर्तियों की मांग ज्यादा है। लोग आकर्षक रंग, चमक और डिजाइन देखकर इन्हें पसंद कर रहे हैं। इनकी कीमत 100 रुपए से लेकर 1000 रुपए तक है।

मिट्टी की प्रतिमाएं बनाने में मेहनत, फिर भी नहीं मिलते खरीदार

पूसा के बिरौली निवासी कुम्हकार विशाल राज पंडित बताते हैं कि मिट्टी की प्रतिमा तैयार करने में काफी मेहनत लगती है। मिट्टी जुटाने से लेकर उसे तैयार करने, प्रतिमा का आकार देने, सुखाने और रंग-रोगन करने तक कई प्रक्रियाओं से गुजरना पड़ता है। इसके बावजूद लोग अब मिट्टी की प्रतिमाओं की जगह पीओपी की मूर्तियां खरीदना अधिक पसंद कर रहे हैं। उन्होंने बताया कि मिट्टी की प्रतिमाएं 50 रुपए से लेकर 500 रुपए तक उपलब्ध हैं। इसके बाद भी खरीदार कम मिलते हैं। कुम्हारों को उचित बाजार और मेहनत के अनुरूप कीमत नहीं मिल पाती है।

गांवों में अब भी कायम है मिट्टी की प्रतिमाओं की परंपरा

कारीगरों का कहना है कि शहरों में पीओपी की प्रतिमाओं का चलन तेजी से बढ़ा है, लेकिन गांवों में आज भी कई परिवार मिट्टी से बनी लक्ष्मी-गणेश की प्रतिमाओं की पूजा करते हैं। काशीपुर में भी मिट्टी की प्रतिमाएं उपलब्ध हैं। इसके अलावा बाजार में सोना, चांदी, पीतल और तांबे जैसी धातुओं से बनी प्रतिमाएं भी बिक रही हैं, जिनकी कीमत धातु और आकार के अनुसार अधिक होती है।

पर्यावरण के लिए भी चिंता का विषय

पीओपी से बनी प्रतिमाओं को पर्यावरण के लिहाज से नुकसानदेह माना जाता है। इनके विसर्जन से जलस्रोतों में प्रदूषण की आशंका रहती है। इसके बावजूद आकर्षक रूप और बाजार में आसानी से उपलब्धता के कारण इनकी मांग बढ़ रही है। दूसरी ओर, मिट्टी की प्रतिमाएं पारंपरिक होने के साथ पर्यावरण के अनुकूल विकल्प मानी जाती हैं। ऐसे में मिट्टी की प्रतिमाओं को बढ़ावा देना जरूरी है। इससे न केवल पारंपरिक कला को बचाया जा सकेगा, बल्कि कुम्हार परिवारों की आजीविका को भी सहारा मिलेगा।

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