विश्वविद्यालय दर्शनशास्त्र विभाग में “मिथिला की दार्शनिक परंपरा” पर एकदिवसीय सेमिनार आयोजित

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Darbhanga News: ललित नारायण मिथिला विश्वविद्यालय के स्नातकोत्तर दर्शनशास्त्र विभाग के तत्वावधान में ‘मिथिला की दार्शनिक परंपरा’ विषय पर एक दिवसीय सेमिनार का भव्य एवं सार्थक आयोजन किया गया। कार्यक्रम का विधिवत शुभारंभ अतिथियों द्वारा पारंपरिक दीप प्रज्ज्वलन के साथ हुआ। इसके उपरांत, कार्यक्रम की गरिमा को बढ़ाते हुए दर्शनशास्त्र विभाग के विभागाध्यक्ष डॉ शिवानन्द झा ने मुख्य वक्ता विश्वविद्यालय संस्कृत विभाग के अध्यक्ष डॉ कृष्णकान्त झा एवं विशिष्ट वक्ता संस्कृत विभाग के एसोसिएट प्रोफेसर एवं पीआरओ डॉ रवीन्द्र नारायण चौरसिया को पुष्प गुच्छ प्रदान कर स्वागत एवं अभिनंदन किया।

डॉ कृष्णकान्त झा ने अपने विस्तृत संबोधन में मिथिला की दार्शनिक भूमि की ऐतिहासिक, आध्यात्मिक और सांस्कृतिक वैभव पर गहराई से प्रकाश डालते हुए कहा कि इसकी गहराई इतनी अधिक है कि इसमें समस्त ज्ञान-विज्ञान समाहित हैं। उन्होंने कहा कि मिथिला केवल एक भौगोलिक क्षेत्र नहीं, बल्कि अनादि काल से ज्ञान, दर्शन, चिंतन और शास्त्रार्थ की वैश्विक प्रयोगशाला रही है। राजा जनक की सभा से लेकर महर्षि याज्ञवल्क्य, गार्गी, गौतम और मंडन मिश्र जैसे मनीषियों ने इसी धरती पर ज्ञान की पराकाष्ठा को छुआ था। उन्होंने जोर देकर कहा कि नव्य-न्याय की जो पद्धति मिथिला में विकसित हुई, उसने भारतीय मनीषा को तार्किक सुदृढ़ता प्रदान की। आज पाश्चात्य दर्शन के सामने मिथिला के दार्शनिक सिद्धांतों को मजबूती से रखने की आवश्यकता है, ताकि विश्व इस अनमोल वैचारिक विरासत से लाभान्वित हो सके।

विशिष्ट वक्ता डॉ आर एन चौरसिया ने अपने विचार साझा करते हुए कहा कि मिथिला की न्याय, मीमांसा और सांख्य दर्शन की परंपरा अत्यंत प्राचीन, वैज्ञानिक और तर्कसंगत है। मिथिला की दार्शनिक परंपरा भारतीय चिंतन की सबसे सशक्त एवं निरंतर परंपरा मानी जाती है। मिथिला को दर्शन की जननी भी कहा जाता है। उन्होंने कहा कि आज के तकनीकी और आधुनिक युग में जहाँ मानसिक तनाव और वैचारिक भटकाव बढ़ रहा है, वहाँ मिथिला का दर्शन जीवन जीने का सही मार्ग दिखाता है। कुमारिलभट्ट और उदयनाचार्य जैसे महान दार्शनिकों के योगदानों को याद करते हुए उन्होंने कहा कि आज की नई पीढ़ी और शोधार्थियों को केवल सतही अध्ययन से बचकर इन मूल ग्रन्थों के गूढ़ रहस्यों को समझना चाहिए, क्योंकि मिथिला के दार्शनिक सिद्धांतों की प्रासंगिकता आज भी उतनी ही अक्षुण्ण है, जितनी सदियों पहले थी।

सेमिनार की अध्यक्षता कर रहे स्नातकोत्तर दर्शनशास्त्र के विभागाध्यक्ष डॉ शिवानन्द झा ने अपने अध्यक्षीय उद्बोधन में विषय की महत्ता को रेखांकित किया। कहा कि मिथिला की दार्शनिक परंपरा भारतीय संस्कृति की अमूल धरोहर है। उन्होंने कहा कि दर्शनशास्त्र विभाग ऐसे गूढ़ और सांस्कृतिक रूप से समृद्ध विषयों पर लगातार अकादमिक विमर्श आयोजित करने के लिए प्रतिबद्ध है, ताकि युवा पीढ़ी अपनी जड़ों जुड़ सके और महान दार्शनिक ज्ञान से सीधे रूबरू हो सके।

सेमिनार में संस्कृत विभाग की वरीय सहायक प्राध्यापिका द्वय डॉ ममता स्नेही और डॉ मोना शर्मा तथा दर्शनशास्त्र विभाग के सीनियर सहायक प्रोफेसर डॉ राजीव कुमार साह उपस्थित रहे और उन्होंने भी सत्र के दौरान अपने महत्वपूर्ण विचार साझा किए।
इससे पूर्व कार्यक्रम के शुरुआत में डॉ संजीव कुमार साह ने सभी नवागंतुक अतिथियों, शिक्षकों, शोधार्थियों और छात्र-छात्राओं का औपचारिक स्वागत किया। कार्यक्रम के सफल समापन पर दर्शनशास्त्र विभाग की डॉ प्रियंका राय ने उपस्थित सभी सम्मानित अतिथियों, प्राध्यापकों, विश्वविद्यालय कर्मियों और विद्यार्थियों के प्रति धन्यवाद ज्ञापन प्रस्तुत किया। इस अवसर पर विभिन्न विभागों के शिक्षक, काफी संख्या में शोधार्थी और छात्र-छात्राएं उपस्थित रहे।

 

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