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परमात्मा ही जीव के सच्चे मित्र हैं, भगवान श्रीकृष्ण-सुदामा की मित्रता आज भी पृथ्वी पर प्रेरणाश्रोत है:-प्राची
Doorbeen News Desk: खानपुर:-श्रीमद्भागवत के श्रवण मात्र से ही पाप से शांति मिलती है।भौतिक संसाधन वास्तविक सुख और शांति को प्रदान नहीं कर सकता।अध्यात्म के सागर में जीव जितनी डुबकी लगाएगा , उतनी ही मात्रा में सुख और शांति के मिलेगी।
श्रीमद्भागवत कथा सुनकर लोग अपने कष्टों को दूर कर सकेंगे।यही साक्षात नारायण हैं।उक्त बातें वृंदावन से आई कथा वाचक साध्वी प्राची ने कही।वे चैती दुर्गा पूजा के अवसर पर वैष्णवी दुर्गा मंदिर रामनगर-रंजीतपुर में आयोजित सात दिवसीय श्रीमद्भागवत सप्ताह ज्ञान यज्ञ के अंतिम दिन श्रद्धालुओं के बीच था परोस रही थी।

उन्होंने कहा कि भगवान के भक्ति से लोग अपने जीवन को सफल कर अपने मार्ग प्रशस्त कर सकते हैं।भक्ति में जो अनुभूति है वह कहीं नहीं है।उन्होंने कथा वाचन को आगे बढ़ाते हुए गोपी उद्वव संवाद के माध्यम से बताया कि भगवान प्रेम, भक्ति से दर्शन देते हैं।ज्ञान का अभिमान होने से भगवान की प्राप्ति नहीं होती है।
और सच्चे ज्ञानी आदमी को कभी अभिमान भी नहीं होता है।उन्होंने भगवान श्रीकृष्ण के सोलह हजार एक सौ आठ विवाह की चर्चा करते हुए कहा कि वेद के 16 हजार उपासना कांड के मंत्र ही भगवान के 16 हजार पत्नियां हैं।तथा 108 उपनिषद ही भगवान के 108 पटरानियां हैं।
उन्होंने सुदामा चरित्र पर प्रकाश डालते हुए कहा कि भगवान संपत्ति, स्वरुप आदि से प्रसन्न नहीं होते हैं।लेकिन प्रेम से कोई भी जीव भगवान को कुछ भी समर्पित कर दे भगवान उसे सहज ही स्वीकार करते हैं।उन्होंने कहा कि कलियुग में केवल भगवान का भजन ही एक मात्र साधन है।
उन्होंने संगीत के माध्यम से श्रोताओं को बताया कि बुरी आदतों को सुधारना ही भगवान का भजन है।जो भी जीव श्रीमद्भागवत कथा का श्रवण सच्चे मन से कर लिया वह स्वयं ही बुरी आदतों को छोड़कर अच्छाई के मार्ग पर चल पड़ेगा।श्रीमदभागवत कथा में ज्ञान का भंडार है।भगवान श्रीकृष्ण के उपदेशों को जीवन मे उतारना ही कथा का मुख्य उद्देश्य है।

पृथ्वी पर कृष्ण-सुदामा की मित्रता आज भी प्रेरणाश्रोत है:-कथा वाचक साध्वी प्राची ने सुदामा चरित्र कथा को आगे बढ़ाते हुए कहा कि परमात्मा ही जीव के सच्चे मित्र हैं।भगवान की मित्रता जीव को संसार के समस्त एश्वर्य को प्रदान करते हुए मुक्ति का साधन स्वरुप हो जाता है।
वर्तमान समय मे भी भगवान श्रीकृष्ण व सुदामा की मित्रता मैत्री का सर्वोत्कृष्ट आदर्श है, जो मानव को मित्रता की सही परिभाषा बताती है।पृथ्वी पर भगवान व सुदामा की मित्रता आज भी भक्तों के लिए प्रेरणाश्रोत है।सुदामा के कठिन परिस्थिति में भगवान श्रीकृष्ण की सहायता एक अलग ही आनंद को दिखलाता है।

उन्होंने एक गीत “अरे द्वारपालों कन्हैया से कह दो, की तुम्हारा सुदामा गरीब आ गया है” के माध्यम से भगवान को बुलाना हर जीवों के बीच मित्रता की मोती बिखेरता है।उन्होंने कहा कि आचरणवान व्यक्ति ही ज्ञानवान हो सकता है।ज्ञानी पुरषों को सभी जगह आनंद की अनुभूति होती है।
::अपने राज गद्दी पर भगवान ने सुदामा को बैठाया:-कथा वाचक ने सुदामा चरित्र श्री कृष्ण रुक्मिणी संवाद, यदुवंशियों को दुर्वाषा ऋषियों का श्राप, कलियुग के दोषों का वर्णन प्रसंग पर चर्चा करते हुए उन्होंने एक श्लोक देखी सुदामा की दिन दशा, करुणा करके करुणानिधि रोए, पानी परात को छुओ नहीं, निज नयनन को जल सो पग धोई का व्याख्यान करते हुए कहा कि जब सुदामा द्वारिका में आए, भगवान श्री कृष्ण ने उन्हें गले लगाया।और अपने गद्दी पर बैठाया।

उनके चरण पखारने मैया रुक्मिणी जल से भरा परात लाई, लेकिन भगवान ने उस जल परात को छोड़ अपने नयनों की बहती धार से सुदामा जी के चरण पखारे।बताया गया कि भगवान के नयन से अश्रुधार इसलिए हुआ कि सुदामा जी भगवान से कभी कुछ नहीं मांगे और फटे कपड़ों में नंगे पांव द्वारिका नगरी पहुंचे।उनके पैर कांटो की जख्म से रक्त का प्रवाह हो रहा था।लेकिन सुदामा जी निराश नहीं हुए।इसलिए भगवान उन्हें देखकर काफी रोए।यज्ञ व पूजा की सफलता में पूजा कमेटी के अध्यक्ष दिनेश ठाकुर, मुखिया शोभा देवी, रामाकांत मिश्र, महेंद्र नारायण झा, सुरेंद्र मिश्र, रामसगुन झा, अशोक झा, राज कुमार राय, अनिल कुमार मिश्र, गुलाब देवी, प्रभात मिश्र, पंडित मनोरंजन झा, विनोद मिश्र सहित समस्त ग्रामीण जुटे हैं।






