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धनुष पूजा, अहिल्या उद्धार एवं राजा जनक द्वारा राजा दशरथ को राम सीता विवाह हेतु आमंत्रण पर प्रसंग सुने भावविभोर
दूरबीन न्यूज डेस्क। समस्तीपुर जिला के खानपुर प्रखंड क्षेत्र अंतर्गत ग्राम पंचायत राज शोभन के बसंतपुर गांव में आयोजित हो रहे श्री श्री 1008 रामचरितमानस महायज्ञ के कार्यक्रम में चल रहे राम कथा में आज पांचवें दिन कथा वाचक जगतगुरु स्वामी श्री राघवाचार्य जी महाराज ने धनुष पूजा, अहिल्या उद्धार एवं राजा जनक द्वारा राजा दशरथ को राम सीता विवाह हेतु आमंत्रण का प्रसंग सुनाया।


रामकथा के आज शुभारंभ से पूर्व मुख्य यजमान श्री शिव शंकर झा एवं परिजनों ने व्यासपीठ की पूजा अर्चना किया तथा व्यासपीठ पर विराजमान स्वामी जी को पुष्प माला पहना कर स्वागत किया। कथा वाचन के दौरान स्वामी जी ने धनुष यज्ञ और राम-सीता विवाह का प्रसंग सुनाया। स्वामी जी ने बताया कि महाराज जनक के पास भगवान शिव का दिव्य धनुष था। एक दिन जनक नंदिनी सीता ने गोबर लेपन के दौरान इस धनुष को एक स्थान से दूसरे स्थान पर रख दिया, यह देख महाराज जनक चकित रह गए। जनक को लगा कि उनकी बेटी में कोई अलौकिक शक्ति है।


उन्होंने निर्णय लिया कि सीता का विवाह उसी पराक्रमी से होगा, जो शिव के पिनाक धनुष को तोड़ सकेगा, स्वयंवर की घोषणा की गई। जिसके बाद जनकपुर जाने के क्रम में जब श्रीराम महर्षि विश्वामित्र के साथ गौतम ऋषि के आश्रम के पास आए तो आश्रम को वीरान अवस्था में देखकर उन्होंने गुरु विश्वामित्र से पूछा कि ये किनका आश्रम है, जो इतना सुनसान है। फिर गुरु विश्वामित्र ने उन्हें गौतम ऋषि के शाप तथा इंद्र देव द्वारा अहिल्या के साथ किए गए छल के प्रकरण को बताते हुए देवी अहिल्या का उद्धार करने को कहा।


श्रीराम के चरण स्पर्श से पत्थर की प्रतिमा बनी देवी अहिल्या का फिर से अपने रूप में वापसी हुआ, कथा सुनते ही श्रोता भाव विभोर हो गए और पूरा पंडाल सियाराम के जयकारों से गूंज उठा। वहीं जनकपुर में राजा जनक द्वारा बुलाए गए सीता स्वयंवर में कई प्रतापी राजा महराजा आए, महर्षि विश्वामित्र के साथ राम-लक्ष्मण भी वहां पधारे, सभी राजाओं ने धनुष उठाने का प्रयास किया, लेकिन कोई इसे हिला तक नहीं सका।
यहां तक कि रावण के भी प्रयास असफल सिद्ध हुए। राजा जनक ने चिंतित स्वर में कुछ वचन कह दिया। जिससे लक्ष्मण क्रोधित होते हुए बोले, कहि जनक जसि अनुचित बानी , विद्यमान रघुकुल मुनि जानी।

तत्पश्चात गुरु विश्वामित्र ने राम की तरफ देखकर कहा उठहुं राम भंजहु भवचापा, मेटहुं तात जनक परितापा, गुरु की आज्ञा पाकर भगवान श्री राम ने धनुष को भंग कर दिया । धनुष टूटने के बाद माता सीता ने प्रभु श्रीराम के गले में वरमाला डाल दिया। आज के रामकथा में अहिल्या उद्धार का प्रसंग सुनकर उपस्थित लोग भावविह्वल हो गए।
मौके पर मुख्य यजमान शिव शंकर झा,राम शंकर झा, बैजनाथ झा,फूलो झा,संजय झा,शशिकांत झा चुनचुन,राघवेंद्र कुमार झा,गोपाल झा,मोहित झा,सचिन झा,गौरव झा,सोनू झा,कृष्णमूर्ति झा,लालबाबू ठाकुर, दीपक झा,केशव झा,विकास झा, आदि उपस्थित रहे।






