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मिथिला सहित अन्य राज्यों में मनाए जाने वाला सतुआनी पर्व मंगलवार को उत्साह पूर्वक मनाया गया।बताया जाता है कि यह पर्व मुख्य रूप से अप्रैल माह में मेष संक्रांति के दिन मनाया जाता है।जिसमें नई फसल (गेहूं, जौ, चना) से बने सत्तू का सेवन और दान किया जाता है।इस दिन खरमास समाप्त होता है और शुभ कार्यों की शुरुआत होती है।हिंदू पंचांग के अनुसार जब सूर्य मेष राशि में प्रवेश करते हैं, तब यह पर्व मनाया जाता है।
यह पर्व स्वास्थ्य, प्रकृति और कृषि से गहराई से जुड़ा है।इस दिन सत्तू, कच्चे आम का टिकोरा, मूली, और गुड़ का सेवन किया जाता है।सुबह स्नान के बाद सत्तू, आम का टिकोरा और गुड़ का दान किया जाता है।इस पर्व के धार्मिक महत्व भी हैं।सतुआन के साथ ही ‘खरमास’ खत्म हो जाता है, और शादिया, मुंडन और गृह प्रवेश जैसे मांगलिक कार्य शुरू हो जाते हैं।बताया गया कि इस पर्व के दिन घर के सभी सदस्य अहले सुबह ही पवित्र स्नान कर पूजा पाठ के बाद चने की सत्तू ग्रहण करते हैं।इस दिन सत्तू खाने का बहुत महत्व है।


::मिट्टी के नए घड़े में जल भरकर अनाज, आम का टिकोरा किया जाता है दान:-ज्योतिष शास्त्र के अनुसार, जब सूर्य देव मीन राशि से निकलकर मेष राशि में प्रवेश करते हैं (मेष संक्रांति), तब यह त्योहार मनाया जाता है।मुख्य रूप से यह पर्व भीषण गर्मी के मौसम के स्वागत और नई फसल के आगमन का प्रतीक है। सतुआन के दिन से ही लोग अपने खान-पान में बदलाव करते हैं और सत्तू खाना शुरू करते हैं।
इस त्योहार की परंपराएं सीधे हमारी सेहत और प्रकृति से जुड़ी हैं।ऐसी मान्यताएं हैं कि इस पर्व के दिन मिट्टी के नए घड़े में जल या मीठी शरबत घोलकर घड़े को भरा जाता हैं।उसमें रक्षासूत्र बांधा जाता है।और उसके ऊपर मिट्टी के एक बर्तन सर्वी में सत्तू, आम का टिकोरा, गुड़ आदि रखकर उसकी पूजा की जाती है।और अनाज, दक्षिणा, फल, श्रृंगार का सामान, लाल कपड़ा के साथ उस घड़े को किसी ब्राह्मण या फिर जरूरतमंद लोगों को दान किया जाता है।इससे पुण्य की प्राप्ति होती है।


::सूर्य देव की होती है उपासना:-सतुआन के दिन सुबह जल्दी उठकर स्नान किया जाता है, और तांबे के लोटे से सूर्य देव को जल (अर्घ्य) अर्पित किया जाता है।इस पर्व से एक दिन पहले एक मिट्टी के नए घड़े में पानी भरकर रखा जाता है।अगले दिन सुबह स्नान के बाद घर का कोई सदस्य उस पवित्र जल का छिड़काव पूरे घर में करता है।मान्यता है कि ऐसा करने से घर की सारी नकारात्मक ऊर्जा दूर हो जाती है, और घर शुद्ध होता है।
और एक दिन बाद जुड़ शीतल मनाया जाता है।जिसमें घर से लेकर सड़क तक, मंदिर, धर्म स्थान में जल से जमीन को भिगोया जाता है।और घर के बड़े बुजुर्ग घर के अन्य सदस्यों को सिर पर जल रखकर सिर को भींगाते हैं, और जुड़ाइल रहने के साथ जीवन में हमेशा खुश रहने का आशीर्वाद देते हैं।साथ ही इस दिन बासी खाना खाने की भी एक पुरानी परंपरा है।इसके साथ ही, प्रसाद के रूप में सत्तू, गुड़ और आम का टिकोरा (कच्चा आम) खाया जाता है।


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