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Doorbeen News Desk: मिथिलांचल की लोक आस्था, परंपरा और सांस्कृतिक विरासत से जुड़ा पावन चौठचंद्र पर्व सोमवार को शिवाजीनगर प्रखंड के विभिन्न गांवों में श्रद्धा और उत्साह के साथ मनाया गया। इस अवसर पर प्रखंड के बंधार, बल्लीपुर, परशुराम, बदहाली, नंदनगरी, करियन, रजौर रामभद्रपुर, डुमरा मोहन, भटौरा, परसा, दहियार, दसौत, बन्दा, बुनियादपुर, लक्ष्मीनिया, कांकर, बेला, चितौड़ा, रानीपरती, बंडीहा, बोरज सहित प्रखंड के विभिन्न गांवों में घर घर पूजा अर्चना की गई।
संध्या समय चंद्रमा के उदय होते ही महिलाओं ने विधि विधान से पूजा कर चंद्रदेव को अर्घ्य अर्पित किया और परिवार की सुख-शांति, समृद्धि, आरोग्य एवं मंगल की कामना की। मिथिला क्षेत्र में भाद्रपद मास की चतुर्थी तिथि को मनाया जाने वाला चौठचंद्र पर्व विशेष धार्मिक एवं सांस्कृतिक महत्व रखता है। पर्व को लेकर सुबह से ही घरों में तैयारियां शुरू हो गई थीं। व्रत रखने वाली महिलाओं ने दिनभर उपवास रखकर संध्या पूजा की तैयारी की।


घर के आंगन और छतों की साफ-सफाई कर पूजा स्थल को सजाया गया। इसके बाद परंपरागत तरीके से केले के पत्ते पर विभिन्न प्रकार के पकवान, फल एवं पूजन सामग्री सजाई गई। चंद्रमा के उदय होने के बाद महिलाओं ने परिवार के सदस्यों के साथ पूजा-अर्चना की। चंद्रदेव को अर्घ्य देने के दौरान घर-आंगन में मंगलगीत गूंजते रहे। पूजा में चावल-दूध की खीर, दही, चना, मौसमी फल, पान-सुपारी, नारियल, धूप-बत्ती सहित अन्य पूजन सामग्री का विशेष महत्व रहा।
कई स्थानों पर महिलाओं ने पारंपरिक विधि से पूजा संपन्न कर परिवार के बड़े-बुजुर्गों का आशीर्वाद लिया। पर्व को लेकर बच्चों और युवक-युवतियों में भी खासा उत्साह देखने को मिला।
ग्रामीण क्षेत्रों में चौठचंद्र पर्व की विशेष रौनक देखने को मिली। शाम ढलते ही महिलाएं सज-धजकर पूजा की तैयारियों में जुट गईं। चंद्रमा के निकलने का इंतजार करती महिलाओं के बीच पर्व से जुड़ी लोक परंपराओं और मान्यताओं पर चर्चा होती रही। चांद दिखाई देते ही पूजा स्थलों पर श्रद्धा का माहौल बन गया।


महिलाओं ने चंद्रदेव की पूजा कर अर्घ्य अर्पित किया और परिवार की खुशहाली की प्रार्थना की।
स्थानीय पंडितों के अनुसार, चौठचंद्र पर्व मिथिला की प्राचीन धार्मिक परंपरा का महत्वपूर्ण हिस्सा है। लोकमान्यता है कि इस दिन श्रद्धापूर्वक चंद्रमा की पूजा और व्रत करने से परिवार में सुख-शांति, समृद्धि और आरोग्य बना रहता है। यह पर्व पारिवारिक संबंधों की मजबूती तथा आपसी प्रेम और सौहार्द का भी प्रतीक माना जाता है। विशेष रूप से भाई-बहन तथा पति-पत्नी के रिश्ते में प्रेम और मंगलकामना से इस पर्व की परंपरा को जोड़ा जाता है।
मिथिलांचल के गांवों में चौठचंद्र की सामूहिक एवं पारंपरिक पूजा की परंपरा आज भी जीवंत है। बदलते समय और आधुनिक जीवनशैली के बावजूद लोगों में इस पर्व के प्रति आस्था कम नहीं हुई है। ग्रामीण क्षेत्रों में आज भी परिवार के सभी सदस्य मिलकर पर्व मनाते हैं। वहीं शहरों और कस्बों में रहने वाले मिथिलावासी भी घर की छत या आंगन में पारंपरिक विधि से पूजा कर अपनी सांस्कृतिक विरासत को जीवित रख रहे हैं।


चौठचंद्र पर्व केवल धार्मिक अनुष्ठान तक सीमित नहीं है, बल्कि यह मिथिला की लोक संस्कृति, पारिवारिक एकता और सामाजिक समरसता का भी परिचायक है। पर्व के दौरान लोकगीतों और पारंपरिक रीति-रिवाजों के माध्यम से नई पीढ़ी को अपनी संस्कृति से जोड़ने का अवसर मिलता है। शिवाजीनगर प्रखंड में भी पूरे उत्साह के साथ पर्व मनाए जाने से गांवों में देर शाम तक उल्लास और भक्ति का वातावरण बना रहा।

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